Wednesday, 12 March 2014

रहल आम क कर्इ बगीचाअब ढ़ूढले एक्कों न पइबाकाशी में र हके काशी कअब तू लगड़ा कभी न खइबानब्बे रूपिया ढोली मघर्इपान बिकल अब कहा घुलइबागस आर्इ जब बादाम पिस्ताकेसर का भाव मोलइबाबाबा के नगरी में बूटीका छनबा और का छनवर्इबकहां से अब काया फरियार्इमहंगार्इ हो गइल अकासीरांड, सांड़, सीढ़ी, से नाहीइनसे बचा त सेवे काशी...

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